क्या कविता केवल सौंदर्य, प्रेम और निजी भावनाओं का माध्यम है? या उसमें अपने समय की असुविधाजनक सच्चाइयों को सामने रखने का साहस भी होना चाहिए? रेखा यादव का संग्रह ‘दिपांजली’ दूसरा रास्ता चुनता है। इसकी अनेक रचनाएँ पाठक को आरामदेह प्रशंसा की स्थिति में नहीं रहने देतीं। वे पूछती हैं कि समाज में दिखावा क्यों बढ़ रहा है, गरीबी और अवसरों की असमानता को सामान्य क्यों मान लिया गया है, नशे से टूटते परिवारों की चिंता कौन करेगा, शिक्षा सबके लिए समान क्यों नहीं है और जाति-धर्म के नाम पर पड़ोसियों के बीच दूरी क्यों पैदा होती है। यह प्रश्नाकुलता पुस्तक के शीर्षक में मौजूद ‘सच्चाई’ के विचार को ठोस अर्थ देती है। यहाँ उजाले की ओर बढ़ना केवल निजी सफलता पाना नहीं, सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी और करुणा को जगह देना भी है।
‘दुनिया का चेहरा’ में कवयित्री अपने आसपास के व्यवहार का तीखा अवलोकन दर्ज करती हैं। उन्हें ऐसे लोग दिखाई देते हैं जो अपनी गलतियों को छिपाकर दूसरों पर आरोप लगाते हैं, संबंधों को स्वार्थ के नीचे दबा देते हैं और दिखावे पर धन खर्च करते हुए जरूरतमंद बच्चों की कठिनाइयाँ अनदेखी कर देते हैं। इस कविता का शिल्प विस्तृत रूपक की अपेक्षा सामाजिक स्थितियों की क्रमिक प्रस्तुति पर टिका है। यह रणनीति पाठक को किसी एक घटना के बजाय पैटर्न देखने के लिए प्रेरित करती है। कविता का मूल प्रश्न व्यक्ति की सफलता से कम और उसकी नैतिक विश्वसनीयता से अधिक जुड़ा है। जब सम्पन्नता और संवेदनशीलता के बीच दूरी बढ़ती है, तब समाज के चेहरे पर कौन-से निशान पड़ते हैं—रेखा यादव इसी बेचैनी को शब्द देती हैं।
‘नशा’ इस सामाजिक दृष्टि का विशेष रूप से ठोस उदाहरण है। कविता केवल यह नहीं कहती कि व्यसन हानिकारक है; वह उसके घरों के भीतर पहुँचने वाले प्रभाव को सामने रखती है। परिवार का भय, बच्चों और जीवनसाथी की चिंता, पीढ़ियों के अवसरों की क्षति और सरकारी राजस्व के प्रश्न कविता के केंद्र में हैं। कवयित्री नशे से प्राप्त आर्थिक लाभ के बरक्स सामाजिक नुकसान पर विचार करने को कहती हैं। कविता में व्यवस्था से सीधे संवाद की मुद्रा है। साहित्य की दृष्टि से यह रचना अपेक्षाकृत घोषणात्मक है, लेकिन उसका महत्व इस बात में है कि वह निजी लत के मुद्दे को सार्वजनिक नीति और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ती है। ऐसे विषयों पर कविता का काम अंतिम नीतिगत समाधान बताना नहीं, उन पीड़ाओं को मानवीय स्वर देना भी है जिन पर आँकड़ों की भाषा अक्सर पर्याप्त रोशनी नहीं डालती।
शिक्षा पर लिखी कविता ‘शिक्षा व्यवस्था’ इस चिंतन को आगे बढ़ाती है। समान शैक्षिक अवसर, सरकारी विद्यालयों की सुविधाएँ, नैतिकता और कौशल आधारित शिक्षा, योग्य युवाओं के लिए रोजगार, तथा परीक्षा में अनुचित हस्तक्षेप जैसे मुद्दे उसकी चिंता में शामिल हैं। यह सूची बताती है कि कवयित्री के लिए शिक्षा मात्र व्यक्तिगत प्रमाणपत्र नहीं, सामाजिक न्याय का साधन है। वे चाहती हैं कि शिक्षा बच्चों को जीवन की गरिमा और कार्यकुशलता दोनों दे। रचना पाठक के सामने एक आवश्यक संबंध स्थापित करती है: यदि स्कूल की व्यवस्था कमजोर है, तो समानता का आदर्श अधूरा रह जाएगा; और यदि शिक्षित युवाओं के लिए सम्मानजनक अवसर नहीं होंगे, तो शिक्षा का सामाजिक वादा भी कमजोर पड़ेगा। इन तर्कों की सरल प्रस्तुति कविता को सार्वजनिक बातचीत में प्रासंगिक बनाती है।
‘ये समाज’ में आक्रोश अधिक तीव्र हो जाता है। कवयित्री हिंसा और विशेष रूप से बालिकाओं के विरुद्ध अपराध के संदर्भ में नैतिकता तथा न्याय व्यवस्था से प्रश्न करती हैं। रचना का विषय स्वभावतः पीड़ादायक है, और उसका उद्देश्य पाठक को सुखद भावभूमि में ले जाना नहीं। उसकी उपयोगिता सामाजिक संवेदना को असहज बनाकर सक्रिय करने में है। कविता में कठोर दंड की माँग भी मिलती है, जिसे पाठक न्याय, रोकथाम और सामाजिक सुधार की व्यापक बहस में रखकर देख सकता है। साहित्य का एक काम किसी एक मत को अंतिम प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करना नहीं, उन स्थितियों पर नैतिक बातचीत शुरू कराना है जिन पर चुप्पी बनी रहती है। ‘दिपांजली’ के इस हिस्से में कवयित्री स्पष्ट पक्षधरता के साथ संवेदनहीनता का विरोध करती हैं।
राष्ट्र और नागरिकता पर आधारित कविताएँ पुस्तक के सामाजिक स्वर को व्यापक बनाती हैं। ‘मेरा देश’ धार्मिक विभाजन, बढ़ती कटुता, किसानों की कठिनाइयों और सैनिकों के त्याग के संदर्भ में सवाल उठाती है। उसकी खास बात यह है कि वह देश के प्रति प्रेम को दूसरे समुदायों से नफरत का पर्याय नहीं बनाती; भाईचारे और शांति की जरूरत पर बल देती है। ‘देश और हम’ में स्वच्छता, शिक्षा, पर्यावरण, भ्रष्टाचार विरोध और सामूहिक प्रयास जैसे विषय आते हैं। इस तरह राष्ट्रप्रेम केवल प्रतीकात्मक भावुकता नहीं रहता। कवयित्री की दृष्टि में अच्छा नागरिक होने का अर्थ लोगों के लिए उपयोगी काम करना भी है। यह दृष्टिकोण विशेष रूप से अर्थपूर्ण है, क्योंकि व्यक्तिगत नैतिकता और सार्वजनिक जिम्मेदारी का संबंध अक्सर हमारी बातचीत से गायब हो जाता है।
संग्रह आर्थिक और सामाजिक पदानुक्रम पर भी विचार करता है। ‘आम आदमी’ में संघर्षशील साधारण जीवन की गरिमा है, जबकि ‘बड़े और छोटे इंसान’ में मनुष्य का मूल्य उसके चरित्र, विनम्रता और मेहनत से आँकने का आग्रह है। यहाँ ऊँचाई पद की नहीं, आचरण की कसौटी पर परखी जाती है। ‘सच्चाई का आइना’ और ‘कमाल के लोग’ जैसी रचनाओं में नैतिक विसंगतियों को देखने का तीखा स्वर मिलता है। ये कविताएँ पाठक को याद दिलाती हैं कि केवल किसी दूसरे की आलोचना करने से हम बेहतर नहीं हो जाते। मूल्य तब सार्थक होते हैं जब वे अपने आचरण में भी उतरें। इस आत्मपरीक्षण का आयाम पुस्तक को महज सामाजिक शिकायतों का संग्रह बनने से रोकता है।
एक उल्लेखनीय विशेषता प्रकृति और सार्वजनिक संसाधनों की चिंता है। ‘पेड़’ पर्यावरण संरक्षण के प्रश्न को उठाती है, जबकि ‘बारिश की बूंदें’ जल, फसल, हरियाली और किसानों के जीवन से वर्षा के संबंध को जोड़ती है। विशेष रूप से बारिश पर रचना केवल प्रकृति की सुंदरता पर नहीं ठहरती। उसमें बाढ़ के कारण होने वाली क्षति का उल्लेख और बेहतर वैज्ञानिक व्यवस्था की आवश्यकता का आग्रह भी है। इस तरह कवयित्री प्रकृति के प्रति रोमानी प्रशंसा तथा व्यावहारिक सावधानी के बीच पुल बनाती हैं। ‘किसान’ जैसा शीर्षक इस बात का संकेत देता है कि अन्न उत्पादन और ग्रामीण श्रम भी उनके संवेदनात्मक संसार का हिस्सा हैं। सामाजिक कविताओं के बीच यह पर्यावरणीय विस्तार संग्रह को उपयोगी विविधता प्रदान करता है।
पुस्तक में ‘सद्व्यवहार’, ‘इन्सानियत’, ‘प्रेम’ और ‘तुम ऐसी सन्तान बनाना’ जैसी रचनाएँ सामाजिक परिवर्तन की बुनियाद को घर और व्यक्तिगत व्यवहार से जोड़ती हैं। यदि बोलने का ढंग अपमानजनक है, तो सार्वजनिक जीवन में सम्मान की बातें अधूरी रह जाएँगी। यदि बच्चे बराबरी और करुणा सीखकर नहीं बड़े होंगे, तो भविष्य की बेहतर व्यवस्था केवल नारा बनकर रह सकती है। ‘तुम ऐसी सन्तान बनाना’ में जातिगत भेदभाव से दूर रहने, महिलाओं का सम्मान करने और घरेलू काम साझा करने का विचार विशेष ध्यान देने योग्य है। यह कविता परिवर्तन के लिए केवल संस्थागत सुधार नहीं, मनुष्य के बनने की प्रक्रिया को भी महत्वपूर्ण मानती है। यहीं संग्रह की सामाजिक आलोचना सकारात्मक नैतिक शिक्षा में बदलती है।
साहित्यिक रूप से देखें तो रेखा यादव का स्वर सीधा, कभी-कभी भाषणात्मक और बार-बार प्रश्न करने वाला है। आधुनिक हिंदी कविता के प्रयोगशील पाठक को यहाँ जटिल रूपक या आत्मसंशय से भरी बहुस्तरीय संरचना कम मिलेगी। इसके स्थान पर सामाजिक प्रतिबद्धता, सहज तुक, आवृत्ति, सार्वजनिक संबोधन और स्पष्ट निष्कर्ष मिलते हैं। कुछ रचनाओं में विचार और कविता का अंतर जानबूझकर पतला दिखाई देता है। यह शैली की सीमा भी हो सकती है और उसकी ताकत भी। सामूहिक पाठ या जागरूकता कार्यक्रम के संदर्भ में स्पष्ट भाषा तत्काल असर उत्पन्न कर सकती है; जबकि गंभीर साहित्यिक पाठ उस विचार के भीतर मौजूद तनाव और बहस को आगे ले जाने का अवसर देता है।
इस संग्रह का मूल्यांकन करते समय उसकी विविधता के साथ उसके नैतिक साहस को भी समझना चाहिए। लेखक के लिए समाज की त्रुटियाँ गिनाना आसान और लोगों के भीतर बदलाव का भरोसा बनाए रखना कठिन है। रेखा यादव इन दोनों के बीच टिकने का प्रयास करती हैं। वह छल, हिंसा, विभाजन और असमानता को पहचानती हैं, लेकिन साथ ही शिक्षा, सहयोग, मेहनत, करुणा और अच्छे आचरण को व्यवहार्य दिशाओं के रूप में प्रस्तुत करती हैं। इस प्रकार ‘दिपांजली’ की सामाजिक कविताएँ निराशा में डूबने के बजाय जिम्मेदारी जगाती हैं। वे पाठक से पूछती हैं कि दुनिया की आलोचना करते समय हम स्वयं क्या बदलने को तैयार हैं।
अंततः ‘दिपांजली’ को सामाजिक चेतना की पुस्तक कहना उचित है, बशर्ते हम याद रखें कि इसमें परिवार, स्मृति, प्रेम और आत्मबल की धाराएँ भी बहती हैं। इसी संगम से उसकी आवाज मानवीय बनती है। यह उन पाठकों के लिए मूल्यवान हो सकती है जो आसान भाषा में ऐसे प्रश्न पढ़ना चाहते हैं जो उनके मोहल्ले, घर, विद्यालय, कार्यस्थल और देश से जुड़े हों। इसकी विशेषता सामाजिक आलोचना को पाठक के नैतिक चुनाव से जोड़ना है। एक दीपक पूरे समाज का अँधेरा अकेला दूर नहीं कर सकता, लेकिन वह किसी व्यक्ति को अगला कदम देखने में सहायता दे सकता है। रेखा यादव की इन कविताओं का सबसे सार्थक आग्रह शायद यही है: रोशनी की माँग करने के साथ रोशनी की जिम्मेदारी भी उठाइए।
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